क्या बतलाऊँ तेरे बाद मैं कैसा जीवन जीता हूँकितना और हारना है कितना भला मैं जीता हूँमेरे सीने में एक समय में दुगना दर्द जो उठता हैतेरे नाम की आठ पहर में सोलह सिगरेट पीता हूँसारी दुनिया के सारे ग़म मुझमें समाए जाते हैंतेरे जाने से मैं भीतर से इतना ज़्यादा रीता हूँएक सफलता के ख़ातिर रोज़ दौड़ना पड़ता हैजैसे मंज़िल हिरन है कोई और मैं कोई चीता हूँरख कर हाथ मेरे सिर पे वो झूठी कसमें खाती हैवो मेरी प्रेम गवाही है मैं श्री कृष्ण की गीता हूँपीएच.डी. तो ज़रूरी है लेकिन समय कहाँ मुझकोइतने ज़ख्म दिये तूने दिन रात उन्हें ही सीता हूँख़ुशियों के सारे पल तो पलक झपकते बीत गयेकरेगी मौत शिकायत कि मैं कितना धीरे बीता हूँ-शीलू अनुरागी
अनसुना कवि:अनकही कविताएँ
Thursday, August 27, 2026
सोलह सिगरेट पीता हूँ||ग़ज़ल||शीलू अनुरागी
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सोलह सिगरेट पीता हूँ||ग़ज़ल||शीलू अनुरागी
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