Thursday, August 27, 2026

सोलह सिगरेट पीता हूँ||ग़ज़ल||शीलू अनुरागी


क्या बतलाऊँ तेरे बाद मैं कैसा जीवन जीता हूँ
कितना और हारना है कितना भला मैं जीता हूँ

मेरे सीने में एक समय में दुगना दर्द जो उठता है
तेरे नाम की आठ पहर में सोलह सिगरेट पीता हूँ

सारी दुनिया के सारे ग़म मुझमें समाए जाते हैं
तेरे जाने से मैं भीतर से इतना ज़्यादा रीता हूँ

एक सफलता के ख़ातिर रोज़ दौड़ना पड़ता है
जैसे मंज़िल हिरन है कोई और मैं कोई चीता हूँ

रख कर हाथ मेरे सिर पे वो झूठी कसमें खाती है
वो मेरी प्रेम गवाही है मैं श्री कृष्ण की गीता हूँ

पीएच.डी. तो ज़रूरी है लेकिन समय कहाँ मुझको
इतने ज़ख्म दिये तूने दिन रात उन्हें ही सीता हूँ

ख़ुशियों के सारे पल तो पलक झपकते बीत गये
करेगी मौत शिकायत कि मैं कितना धीरे बीता हूँ

 -शीलू अनुरागी


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सोलह सिगरेट पीता हूँ||ग़ज़ल||शीलू अनुरागी

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