Saturday, July 25, 2026

भूल गई||ग़ज़ल||शीलू अनुरागी


 

है उसकी हालत कैसी खस्ता भूल गई है
वो पल पल उसको रहे तरसता भूल गई है
 
वो तेरी मुस्कान थी उसको याद है क्या?
छलक आँख का आँसू कहता भूल गई  
 
जब से सोचा बच्चे को शिक्षित करना है
तब से ही माँ महंगा सस्ता भूल गई है
 
पढ़ने के ख़ातिर इतने पापड़ पड़े बेलने
वो घर पर ही अपना बस्ता भूल गई है
 
आधा जीवन भटक के मुझको लगता है
मंज़िल मेरे कदमों का रस्ता भूल गई है
 
मेरे जीवन का उसने उपहास बना डाला
मैं मर जाऊँगा हँसता-हँसता भूल गई है
 
-शीलू अनुरागी

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