Friday, July 24, 2026

मरता चला गया||ग़ज़ल||शीलू अनुरागी||




लम्हा-लम्हा हर पल वक़्त गुज़रता चला गया।
क़तरा-क़तरा मेरा जीवन बिखरता चला गया।

नामुमकिन है यूँ तो पानी में आग लगा पाना
पर मैं ऐसी अनहोनी को करता चला गया।

सब फूल राह के छोड़ दिये मैंने उसके खातिर
अपने कदमों को काँटों पर धरता चला गया।

उसने देखा मुझको जितनी खस्ती हालात में
उतना ज़्यादा उसका रूप निखरता चला गया।

वैसे उसके प्रेम भँवर में डूब चुका था मैं
रोककर अपनी साँसों को उभरता चला गया।

जो यादें मेरे सीने पर करती रहीं ज़ख़म
हर घाव उन्हीं के मरहम से भरता चला गया।

अब भी मोहब्बत का वादा निभा रहा हूँ मैं,
जबकि वो हर वादे से मुकरता चला गया।

ऐसे रहा मैं दुनिया की तनहाई व महफ़िल में,
बाहर जीवित भीतर-भीतर मरता चला गया।

-शीलू अनुरागी

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