अपनी छत पाता नहीं है सर किराएदार का
हो के भी होता नहीं कोई घर किराएदार का
किसी ताश की गड्डी सी हैं शर्तें मकानों में जहाँ
पत्ते सभी मालिक के हैं जोकर किराएदार का
चाहे कॉलोनी हो वही चाहे गली भी हो वही
होता नहीं निश्चित मकाँ नंबर किराएदार का
नालियाँ बनने लगीं और गलियाँ ऊँची हो गईं
गड्ढे की तरह हो गया तब घर किराएदार का
होने लगी बरसात ज़ोरों की अचानक रात में
नाली के जैसा तब गया घर भर किराएदार का
पैसे भी मालिक को दें सौ बात भी सुननी पड़ें
सम्मान जाता है कहीं तब मर किराएदार का
जब निकलता है कोई घर ढूँढ़ने को शहर में
दर-दर भटकता तब मुक़द्दर किराएदार का
इस मकाँ से उस मकाँ सामान जाए किस तरह
काँपे कलेजा सोच कर थर-थर किराएदार का
कुछ किराएदार पा लेते हैं मंज़िल हाँ मगर
ख़्वाब जी पाता नहीं है हर किराएदार घर
-शीलू अनुरागी
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