Wednesday, July 15, 2026

हजार हार मिलीं||ग़ज़ल||शीलू अनुरागी||




हजार हार मिलीं पर ज़रा सी आस रही
जहाँ जहाँ भी रहा मैं उदासी साथ रही

उसके जाने से मेरे भाव भी खिलाफ़ हुए
दुखों ने जश्न मनाया ख़ुशी उदास रही

कई सागर भी उसे मिलके बुझा पाए नहीं
जो एक कतरा मेरे दिल की प्यास रही

कहूँ तो एक झलक को भी तरसता ही रहा
सोचूँ तो वो हमेशा मेरे आसपास रही

उसकी बकबक भी सुनी है मैंने गंभीरता से
मेरी हर बात ही उसके लिए बकवास रही

मेरा अपमान उसने किया और कराया भी
उसकी दी गालियाँ भी मेरे लिए खास रही

वो जिसके साथ है सुन्दर है पैसे वाला है
नहीं अब मेरी कोई कीमत-ओ-औकात रही

-शीलू अनुरागी


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