Thursday, August 27, 2026

सोलह सिगरेट पीता हूँ||ग़ज़ल||शीलू अनुरागी


क्या बतलाऊँ तेरे बाद मैं कैसा जीवन जीता हूँ
कितना और हारना है कितना भला मैं जीता हूँ

मेरे सीने में एक समय में दुगना दर्द जो उठता है
तेरे नाम की आठ पहर में सोलह सिगरेट पीता हूँ

सारी दुनिया के सारे ग़म मुझमें समाए जाते हैं
तेरे जाने से मैं भीतर से इतना ज़्यादा रीता हूँ

एक सफलता के ख़ातिर रोज़ दौड़ना पड़ता है
जैसे मंज़िल हिरन है कोई और मैं कोई चीता हूँ

रख कर हाथ मेरे सिर पे वो झूठी कसमें खाती है
वो मेरी प्रेम गवाही है मैं श्री कृष्ण की गीता हूँ

पीएच.डी. तो ज़रूरी है लेकिन समय कहाँ मुझको
इतने ज़ख्म दिये तूने दिन रात उन्हें ही सीता हूँ

ख़ुशियों के सारे पल तो पलक झपकते बीत गये
करेगी मौत शिकायत कि मैं कितना धीरे बीता हूँ

 -शीलू अनुरागी


Saturday, July 25, 2026

भूल गई||ग़ज़ल||शीलू अनुरागी


 

है उसकी हालत कैसी खस्ता भूल गई है
वो पल पल उसको रहे तरसता भूल गई है
 
वो तेरी मुस्कान थी उसको याद है क्या?
छलक आँख का आँसू कहता भूल गई  
 
जब से सोचा बच्चे को शिक्षित करना है
तब से ही माँ महंगा सस्ता भूल गई है
 
पढ़ने के ख़ातिर इतने पापड़ पड़े बेलने
वो घर पर ही अपना बस्ता भूल गई है
 
आधा जीवन भटक के मुझको लगता है
मंज़िल मेरे कदमों का रस्ता भूल गई है
 
मेरे जीवन का उसने उपहास बना डाला
मैं मर जाऊँगा हँसता-हँसता भूल गई है
 
-शीलू अनुरागी

Friday, July 24, 2026

घर किरायदार का||ग़ज़ल||शीलू अनुरागी||




अपनी छत पाता नहीं  है सर किराएदार का
हो के भी होता नहीं कोई घर किराएदार का
 
किसी ताश की गड्डी सी हैं शर्तें मकानों में जहाँ
पत्ते सभी मालिक के हैं जोकर किराएदार का
 
चाहे कॉलोनी हो वही चाहे गली भी हो वही
होता नहीं निश्चित मकाँ नंबर किराएदार का
 
नालियाँ बनने लगीं और गलियाँ ऊँची हो गईं
गड्ढे की तरह हो गया तब घर किराएदार का
 
होने  लगी बरसात  ज़ोरों की  अचानक रात में 
नाली के जैसा तब गया घर भर किराएदार का
 
पैसे भी मालिक को दें सौ बात भी सुननी पड़ें
सम्मान जाता है  कहीं तब मर  किराएदार का
 
जब निकलता है कोई घर ढूँढ़ने को शहर में
दर-दर भटकता तब  मुक़द्दर किराएदार का
 
इस मकाँ से उस मकाँ सामान जाए किस तरह
काँपे कलेजा सोच  कर थर-थर किराएदार का 
 
कुछ किराएदार पा लेते हैं मंज़िल  हाँ मगर
ख़्वाब जी  पाता नहीं  है हर किराएदार घर
 
          -शीलू अनुरागी

Wednesday, July 15, 2026

हजार हार मिलीं||ग़ज़ल||शीलू अनुरागी||




हजार हार मिलीं पर ज़रा सी आस रही
जहाँ जहाँ भी रहा मैं उदासी साथ रही

उसके जाने से मेरे भाव भी खिलाफ़ हुए
दुखों ने जश्न मनाया ख़ुशी उदास रही

कई सागर भी उसे मिलके बुझा पाए नहीं
जो एक कतरा मेरे दिल की प्यास रही

कहूँ तो एक झलक को भी तरसता ही रहा
सोचूँ तो वो हमेशा मेरे आसपास रही

उसकी बकबक भी सुनी है मैंने गंभीरता से
मेरी हर बात ही उसके लिए बकवास रही

मेरा अपमान उसने किया और कराया भी
उसकी दी गालियाँ भी मेरे लिए खास रही

वो जिसके साथ है सुन्दर है पैसे वाला है
नहीं अब मेरी कोई कीमत-ओ-औकात रही

-शीलू अनुरागी


Tuesday, March 5, 2024

||थी कौन, कहाँ से आई थी||कविता||शीलू अनुरागी||

 


थी कौन, कहाँ से आई थी

थी कौन, कहाँ से आई थी, पूछा नहीं उसका हाल।
जिसके अधर मितभाषी थे, पर नैन बहुत वाचाल।

हवा के संग में उड़ता था,
परचम सा उसका आँचल।
आँखों में अपनी डाले थी,
कजली से काला काजल।

वो एक टक मुझको देखे थी,
ऊपर से न नीचे पलक गई।
उसने जब पल्लू को पकड़ा,
थोड़ी सी हथेली झलक गई।

पल्लू के किनारे को उसने,
दाँतों से अपने दाब लिया।
उड़ती कोंछि जब देखी तो,
घुटनों में उनको दाब दिया।

उसके रूखे-काले हाथों ने,
कितने ही दुख झेले होंगे।
औरों को करते हुए साफ,
ये खुद भी हुए मैले होंगे।

ई-रिक्शा में बैठी थी वो, क्या देखते उसकी चाल।
जिसके अधर मितभाषी थे, पर नैन बहुत वाचाल।

हल्का गले में मैल जमा था,
पतली काली सी नख जैसे।
जैसे कि बढ़ना छोड़ा चुके,
लगते थे उसके नख ऐसे।

सर्द सा मौसम था, वो भी,
हल्की सी अकुलाई थी।
पूरी बाजू का पहन पोल्का,
धान काट कर आई थी।

वैसे तो गैर नहाई थी पर,
आँखों में उज्ज्वल नूर भी था।
प्रौढ़ावस्था थी उसकी औ,
माथे पर लाल सिंदूर भी था।

एक यही साधन देखा था,
उसके सरल सिंगार में तब।
जो खूब इज़ाफ़ा करता था,
नैनों के बड़े आकार में तब।

आँखों में उत्तर थे उससे, करता क्यों भला सवाल।
जिसके अधर मितभाषी थे, पर नैन बहुत वाचाल।

मेरा पहनावा देख ज़ुबाँ,
बोली तुम कहाँ से आये हो?
नैना बड़बोले बोल उठे,
तुम मेरे हृदय को भाए हो।

मुस्कान की रेखा कहती थी,
वो भी कभी हँसती होगी।
कही-अनकही दोनों हृदय में,
इच्छाएँ भी बसती होंगी।

क्या-क्या नित सहती उसने,
कितना वहशीपन सह डाला।
पर प्रेम की कितनी प्यासी थी,
रूखे अधरों ने कह डाला।

मैंने उसकी दो आँखों में,
अपनी ही छवि बसती देखी।
नज़रों के दस्तक देने पर,
उसकी अँगिया कसती देखी।

उसकी दो छतियाँ दच्ची में, देती आपस में ताल।
जिसके अधर मितभाषी थे, पर नैन बड़े वाचाल।

मुस्काकर उसने प्रश्न किया,
क्या एक बात बतलाओगे?
बुरा न मानो तो कहिए कि,
आप कहाँ को जाओगे?

मैं बोला इस रिक्शे से मुझे,
बस यहीं, 'नरैनी' जाना है।
कभी-कभी मैं आता हूँ,
न रोज का आना-जाना है।

कुछ ही क्षणों में हम दोनों,
उस चौराहे पर पहुँच गए।
जहाँ अलग रास्ते दोनों के,
उस दोराहे पर पहुँच गए।

बस आ..कर, वो अटक गई,
शायद कुछ उसको कहना था।
फिर हँसकर आगे चली गई,
जीवन भर थोड़ी रहना था।

पर वो कुछ देर को भूली थी, अपने जी के जंजाल।
जिसके अधर मितभाषी थे, पर नैन बड़े वाचाल।

16-12-2021

-शीलू अनुरागी

Monday, August 28, 2023

||इक दूजे से नाराज रहे||ग़ज़ल||शीलू अनुरागी||


इक दूजे से नाराज रहे

इक दूजे से नाराज़ रहे, संकेतों से सब बात हुई
सोचो मुझे बतओ तो, क्या ये भी कोई बात हुई?

दिन तो पूरा बीत गया, यहाँ-वहाँ की उलझन में
लेकिन तेरी याद आ गई, जैसे ही फिर रात हुई

बीते जेठ से सभी मास, नैनों में नमी नहीं आई
खूब बही अश्रु धारा, जब भादों में बरसात हुई

मोर-पपीहा-दादुर बोले, जैसे ही सावन आया
यूँ बाहों की कमी खली, झूले की जब बात हुई

मैंने इस छोटे झगड़े में, बड़ा मुनाफा ये पाया
एक बार की चुप्पी से, ग़ज़लें कई इज़ात हुई

तेरी-मेरी ख़ता नहीं, प्रेम में ये स्वाभाविक है
नोक-झोंक में अनुरागी, जीत हुई न मात हुई

-शीलू अनुरागी

Wednesday, August 16, 2023

||मेरी इस ज़िंदगानी में||कविता||शीलू अनुरागी||

 


मेरी इस ज़िंदगानी में

मेरी इस ज़िंदगानी में, वक़्त की ऐसी लहर गई।
कभी नदिया सी ये बह निकली, कभी पर्वत सी ये ठहर गई।

कभी तन्हाई में भीड़ रही,
कभी भीड़ को तन्हा मान लिया।
कभी अपनों को गैर बता डाला,
कभी गैरों को अपना जान लिया।
कभी खुद को सफल बनाने को, ये तो दिन-दोपहर गई।
कभी नदिया सी ये बह निकली, कभी पर्वत सी ये ठहर गई।

कभी काली रात का सूनापन,
तो कभी दिन का शोर चुना।
कभी मधुबन में भी काँव-काँव,
कभी कू-कू को हर ओर सुना।
संतुष्टि को पाने के लिये, कभी गाँव गई, कभी शहर गई।
कभी नदिया सी ये बह निकली, कभी पर्वत सी ये ठहर गई।

इक झोंके से कभी बिखर गई,
कभी लाख थपेड़े सह डाले।
कभी बोल के कुछ ना कह पाए,
कभी बिन बोले सब कह डाले।
कभी अपनों को बन सज़ा मिली, कभी दुश्मन पर कर महर गई।
कभी नदिया सी ये बह निकली, कभी पर्वत सी ये ठहर गई।

कभी काँटों को पग-पग पहना,
कभी माथे पुष्प नहीं साजे।
कभी डोली में रहा सन्नाटा,
कभी अर्थी पर बजते बाजे।
कभी जीवन से ही हार गई, कभी मौत पर भी ढा क़हर गई।
कभी नदिया सी ये बह निकली, कभी पर्वत सी ये ठहर गई। 


-शीलू अनुरागी

Thursday, August 10, 2023

||क्यों नहीं आता तुझे?||ग़ज़ल||शीलू अनुरागी||

 क्यों नहीं आता तुझे?

अनकहे को जान जाना, क्यों नहीं आता तुझे?
दर्द-प्यार में अंतर लगाना, क्यों नहीं आता तुझे?

हाँ, मैं नाराज हूँ, परेशान हूँ, ये भी मैं ही बताऊँ!
अंदाज़ से अंदाज़ा लगाना, क्यों नहीं आता तुझे?

क्या हुआ? कैसे हुआ? हर बार पूछती है तू ये,
तीर को तम में चलाना, क्यों नहीं आता तुझे?

ये हैरानी भरे सवाल कर, दर्द और बढ़ा देती है,
घाव पर मरहम लगाना, क्यों नहीं आता तुझे?

बड़ा अच्छा लगता है, पल भर में रूठना तुझे,
तो आज मेरा रूठ जाना, क्यों नहीं भाता तुझे?

जिस तरह तुझे मनाया, हर बार रूठने पर तेरे,
ठीक वैसे ही मनाना, क्यों नहीं आता तुझे?

हमारी उड़ती रहें रातों की नींदें सोती रहे तू चैन से,
मेरी फिक्र में खुद को जगाना, क्यों नहीं आता तुझे?

सदा पलकों को बिछाएँ, हम ही तेरी राह पर,
प्यार में खुद को झुकाना, क्यों नहीं आता तुझे?

-शीलू अनुरागी

Thursday, July 20, 2023

||बात बनाना आता है||शीलू अनुरागी||

 बात बनाना आता है

लेकर जन्म जो भारत में,
इस दुनिया में आता है।
कुछ और उसे न आए लेकिन,
बात बनाना आता है।

किसी को इज्जत ढकने को,
इक चिथड़ा तो ये देना सकें ।
लेकिन देख कर उसकी हालत,
तरस जताना आता है।
कुछ और उसे न आए लेकिन
बात बनाना आता है।

दुर्घटना के आसारों पर,
कभी रोक लगा न पाएँ ये।
लेकिन दुर्घटना घटने पर,
इन्हें भीड़ लगाना आता है।
कुछ और उसे न आए लेकिन,
बात बनाना आता है।

अपनी ग़लती जितनी भी हो,
स्वीकार नहीं कभी करते हैं।
पर गलती का इक-दूजे पर,
इल्ज़ाम लगाना आता है।
कुछ और उसे न आए लेकिन,
बात बनाना आता है।

क़ानून भी अपने भारत का,
मानो यार गजब का है।
जल्दी का मतलब जाने ना,
पर देर लगाना आता है।
कुछ और उसे न आए लेकिन,
बात बनाना आता है।

लूट आबरू की जो करते,
उन्हें दण्ड ये देना सकें ।
पर पन्छी की आज़ादी पर,
पाबंद लगाना आता है।
कुछ और उसे न आए लेकिन,
बात बनाना आता है।

-शीलू अनुरागी

Sunday, February 12, 2023

करामात करती है||कविता||शीलू अनुरागी

 
6.करामात करती है

कोई जो कर नहीं सकता वो ऐसी बात करती है।
मेरे महबूब की हर इक अदा करामात करती है।

अपनी रेशम सी ज़ुल्फों को, झटकर जब वो बिखराये,
घनेरी छाँव से उनकी दिन में भी रात हो जाये,
उठा दे गर वो घूँघट को अपने नूरानी चहरे से...
चमक से उसके चेहरे की रात दिन में बदल जाये।
अमावस रात में निकले तो पूनम रात करती है।
मेरे महबूब की हर इक अदा करामात करती है।

झूमकर अपने आँचल को अगर लहराने लगती है,
सूखे पतझड़ में भी रंगीं बहारें आने लगती हैं,
काले काजल को डाले जब वो अपने नीले नैनों में..
काली-काली कातिलाना घटायें छाने लगती हैं।
ऐसे हर आँख किया बादल बिना बरसात करती है।
मेरे महबूब की हर इक अदा करामात करती है।

होकर मगन मस्ती में जब वो मुस्कुराती है,
फूल बनकर जवाँ कलियाँ भी संग में मुस्कुराती हैं,
धड़कता है जो दिल उसका तो शाखें हिलने लगती हैं..
झूमती है फिज़ा ठंडी हवायें चलने लगती हैं।
मिलाकर वो पलक अम्बर-ज़मीं इक साथ करती है।
मेरे महबूब की हर इक अदा करामात करती है।

चलती है जब वो बलखाकर नदी बलखाने लगती है,
शांत झीलें भी कल-कल के तराने गाने लगती हैं,
करती है जब मधुर झनकार उसके पैर की पायल..
जाने कितनों कि जाँ में जान यारो आने लगती है।
मरों में भी वो पैदा जोश और जज़्बात करती है।
मेरे महबूब की हर इक अदा करामात करती है।

बेमतलब बड़ी बातें ओ यारो मैं नहीं करता,
उसकी बिंदिया की बिजली से है यारो हर कोई डरता,
चाहता हूँ मैं यारो अब उसी के दिल में बस रहना..
उसके बारे में यारो अब है मुझको बस यही कहना।
नामुमकिन को भी मुमकिन वो रातों रात करती है।
मेरे महबूब की हर इक अदा करामात करती है।

-शीलू अनुरागी

Wednesday, February 8, 2023

तू प्रेम में मेरे राधा बन जा||कविता||शीलू अनुरागी

 

5. तू प्रेम में मेरे राधा बन जा

तू प्रेम में मेरे राधा बन जा,
कृष्ण तेरा बन जाऊँ मैं।
तू नंद लला की बन बंसी,
अधरों से तुझे लगाऊँ मैं।

पवनों के तेज झकोरों में,
बिरज की संकरी खोरों में।
सूफी और संत-फकीरों में,
जमुना में, दोनों तीरों में।
कान्हा-कान्हा तेरी तान लगे,
और राधे-राधे गाऊँ मैं।
तू प्रेम में मेरे राधा बन जा,
कृष्ण तेरा बन जाऊँ मैं।
तू नंद लला की बन बंसी,
अधरों से तुझे लगाऊँ मैं।

चोरी कर माखन खाने से,
तेरी मटकी फोड़ गिराने से।
तेरी राह सदा ही रोकूँ मैं,
जब आये तू बरसाने से।
नोक-झोक में बार-बार,
तू रूठे, तुझे मनाऊँ मैं।
तू प्रेम में मेरे राधा बन जा,
कृष्ण तेरा बन जाऊँ मैं।
तू नंद लला की बन बंसी,
अधरों से तुझे लगाऊँ मैं।

होली में चोली मसक जाए,
हिय तेरा कुछ कसक जाए।
लट्ठों से कुछ ऐसी मार घले,
टोली की टोली फसक जाए।
श्याम-श्याम तेरा अंग-अंग,
राधा-राधा रँग जाऊँ मैं।
तू प्रेम में मेरे राधा बन जा,
कृष्ण तेरा बन जाऊँ मैं।
तू नंद लला की बन बंसी,
अधरों से तुझे लगाऊँ मैं।

दूर क्षितिज में मिल जाएँ,
तू और मैं अवनि-अम्बर से।
तेरे लहँगा चोली खूब फबें,
मेरे मोर पखा पीतम्बर से।
प्रेमानल से शीतल हो तू,
दृग्जल से जल जाऊँ मैं।
तू प्रेम में मेरे राधा बन जा,
कृष्ण तेरा बन जाऊँ मैं।
तू नंद लला की बन बंसी,
अधरों से तुझे लगाऊँ मैं।

मिलन भले ही क्षण का हो,
कली पर जैसे भ्रमर रहे।
पृथ्वी लोक पर प्रेम हमारा,
युगों-युगों तक अमर रहे।
नामों का ऐसा युगल बने,
तेरे बाद पुकारा जाऊँ मैं।
तू प्रेम में मेरे राधा बन जा,
कृष्ण तेरा बन जाऊँ मैं।
तू नंद लला की बन बंसी,
अधरों से तुझे लगाऊँ मैं।

-शीलू अनुरागी

Tuesday, February 7, 2023

बात बहुत साधारण है||ग़ज़ल||शीलू अनुरागी

 

4. बात बहुत साधारण है।

बस आँखों का दरबार हुआ है, बात बहुत साधारण है।
इक तीर जिगर के पार हुआ है, बात बहुत साधारण है।

यूँ घायल होकर भी हँसना, सच मानो एक अचम्भा है,
सोचो कि ये कैसा वार हुआ है, बात बहुत साधारण है।

तुम इतने नादान नहीं जो, हम तुम तुमको बतलायें कि,
दिल क्यों इतना लाचार हुआ है, बात बहुत साधारण है।

दिल-धड़कन कुछ ज़्यादा है, आँखों में नींद नहीं बाकी,
इक सपना सा साकार हुआ है, बात बहुत साधारण है।

इससे पहले तक जो जीवन, बुझा-बुझा सा लगता था,
उसका ही नव अवतार हुआ है, बात बहुत साधारण है।

तुमने मुझको अपनाया मैं, अपनों द्वारा ठुकराया था,
मुझ पर तेरा उपकार हुआ है, बात बहुत साधारण है।

मैंने तुमको, तुमने मुझको, भला आज क्यों अपनाया,
अपनों जैसा व्यवहार हुआ है, बात बहुत साधारण है।

बिन पेंदी था जीवन मेरा, जिसको कि तेरा साथ प्रिय,
अब जीवन का आधार हुआ है, बात बहुत साधारण है।

इसमें तुमको क्या बतलाएँ, क्या खोया और क्या पाया?
सुख-दुख का व्यापार हुआ है, बात बहुत साधारण है।

अब गोल-गोल बातें कर शीलू, बातों को उलझायेे क्यों?
अरे! हमको तुमसे प्यार हुआ है, बात बहुत साधारण है।

-शीलू अनुरागी

प्रेम में भौतिकी||कविता||शीलू अनुरागी

 


3.प्रेम में भौतिकी

न्यूटन का तीसरा नियम,
कहता है,
क्रिया के विपरीत
तथा बराबर
प्रतिक्रिया होती है।
लागू होता है,
यही नियम,
प्रेम में भी।
मैं जितना प्रेम
करता था उससे,
ठीक उतनी ही नफरत,
करती थी वो मुझसे।
बावजूद इसके,
अक्सर टकराते थे,
हम दोनों,
चलते-फिरते,
कहीं न कहीं
यकीनन ये,
गुरुत्वाकर्षण के सार्वभौमिक,
नियम के कारण ही था।
यदि आज,
हम नहीं टकराते,
एक दूसरे से,
तो उसकी वजह,
हमारे बीच की,
बढ़ती दूरी,
और हमारे भीतर समाहित,
दुखों का कम,
द्रव्यमान।
जिससे,
कम हो गया है,
आकर्षण बल।
इतना कम कि,
अब हमारा मिलना,
असंभव सा है।
मगर फिर भी,
मुझे जिससे प्रेम था,
उसी से रहेगा,
जब तक कि,
कोई अन्य मुझे,
प्रभावित नहीं करता।
जैसे कि कहता है,
जड़त्व का नियम।
यानि प्रेम में,
लागू होते हैं
भौतिकी के साधारण नियम,
अतः प्रेम,
विज्ञान समझता है।

-शीलू अनुरागी

Sunday, February 5, 2023

क्या बताऊँ||ग़ज़ल||शीलू अनुरागी

 


2. क्या बताऊँ?

क्या बताऊँ मेरे दिल का क्या हाल रहता है।
हर पल ये तेरी याद में बेहाल रहता है।

जन्नत परी या उर्वशी कुछ भी नहीं हैं अब,
सब में बस तुझे ही बेमिसाल कहता है।

नब्ज़ देख ले कोई या रख दे दिल पे हाथ,
अब धड़कनों में एक ही सवाल रहता है।

जिससे ज़रा सी ठेस न बर्दाश होती थी,
कैसे वो दर्द-ए-दिल भी कमाल सहता है।

क्या हुई है ख़ता मुझसे क्यों तू बोलती नहीं,
बता दे तेरे दिल में क्या मलाल रहता है।

न जान पाए दुनिया पर समझ जाए तू,
कुछ इस तरह से शीलू अपना हाल कहता है।

-शीलू अनुरागी


Thursday, February 2, 2023

विचार कर रहा हूँ||ग़ज़ल||शीलू अनुरागी

 

विचार कर रहा हूँ

आज-कल मैं कुछ ऐसा, व्यापार कर रहा हूँ।
हर ग्राहक पर कुछ न कुछ, उधार कर रहा हूँ।

तुम पर विचार करने का, विचार क्यों किया?
मैं इन दिनों बस इक यही, विचार कर रहा हूँ।

धधके है दिल की भट्टी, और प्रेम जल रहा है,
अपने आँसुओं को अब मैं, अंगार कर रहा हूँ।

अब तक मेरी नज़र में, निराकार सा रहा जो,
उसको ही रात-दिन मैं, साकार कर रहा हूँ।

कि वो मेरे लिए है अब, ज्यों तीस फरवरी है,
इक मैं हूँ कि उसी का, इन्तज़ार कर रहा हूँ।

हृदय सत्ता को पाकर, जो लूट गया सब कुछ,
इस बार भी मैं उसकी ही, सरकार कर रहा हूँ।

अवगुण में तेरे सद्गुण ही, खोजता फिरूँ मैं,
ये किस तरह का तुझसे, मैं प्यार कर रहा हूँ?

शीलू तुम्हें पता हैं सब, शंकाओं के निवारण,
क्यों मैं उसी पर सब कुछ, निसार कर रहा हूँ।

-शीलू अनुरागी

Friday, April 29, 2022

प्रेम में विरोधाभास या विरोधाभास में प्रेम

आज, 29 अप्रैल 2022, को विश्व विद्यालय से घर की तरफ आते हुए जब राजीव चौक से द्वारका की ओर आने वाली ब्लू लाइन मेट्रो में बैठा तो देखा कि मेरे ठीक सामने प्रौढ़ अवस्था के पति-पत्नी भी आकर बैठ गए। दोपहर के लगभग डेढ़ बजे होंगे। चिलचिलाती धूप से आकर जैसे ही मेट्रो में सीट मिली एक फुरसत की साँस ली और नींद मुझे अपनी गिरफ्त में लेने लगी। कई बार ऐसा होने पर मैं अपने गंतव्य से कुछ आगे निकल गया इसलिए इस बार पूरी सुप्त अवस्था में न जाकर जगनिंदिया लेने की सोची। मेरी पलकें भारी हो रहीं थी अतः मैंने उन्हें ढीला छोड़ नेत्र पाटल बंद कर लिए। किंतु पूर्णतः नींद में नहीं था जिसके परिणामस्वरूप मुझे आस पास की आवाज़ें सुनाई दे रही थीं। बाईं ओर बैठे यूवक की फोन की टोन बज रही है, "दम मारो दम, मिट जाएँ ग़म.." दाईं ओर एक लंबी चौड़ी हृष्ट-पुष्ट लडक़ी बैठी है जिसकी ऊँचाई साढ़े पाँच फ़ीट के करीब होगी और वो बार अपनी टाँगों की अवस्था बदल रही थी और क्रॉस की हुई टांगों में कभी दाईं टाँग ऊपर रखती तो कभी बाईं टाँग। उसके ठीक बाद एक पंजाबन आंटी बैठी हुई थी जो ज़ोर-ज़ोर से फोन पर बात कर रही थीं।  मेरे दाईं ओर के गेट के पास दो स्कूली छात्राएँ आपस में हँसी ठिठोली कर रही थीं। और मेट्रो का सोचना सिस्टम अपनी ही धुन में बिना किसी अवरोध के चल रहा था, "अगला स्टेशन रामकृष्ण आश्रम मार्ग है..." इसी वातावरण के बीच एक अलग ही ग्रामीण बोली बोली और लहजे में आवाज़ सुनाई दी। "लाओ खा लैवें जाय, फाड़ दौं जा चिपस के पैकेटै।" बोली से उत्तर प्रदेश के इटावा या एटा जिले के लग रही थी उसको बोलने वाली। वैसे अन्य कई गतिविधियों के चलते मेरी पलकें पुतलियों को ढके रहीं लेकिन इस आवाज़ में ऐसा आकर्षण था कि मेरी पलकें झट से ऊपर उठ गईं। नज़रें क्या देखती हैं कि सारी पहने उस महिला घुटनों के बीच तो दूरी है लेकिन हवाई चप्पल पहने हुए पंजे आपस में गले मिले रहे हैं। साथ ही में बैठे उसके पति ने भी कुरुम के जूते पहने हैं और अपने चेहरे से छोटा मास्क लगा रखा है। उसने एक पैर  का जूता पूरी तरह उतार रखा है और दूसरे पैर का पंजा हल्का सा जूते के अंदर है। खैर ये सब छोड़ो बात पर आते हैं पति से चिप्स का पैकेट फाड़ने की बात कहने के बाद उसने पैकेट को फाड़ा और उसमें नाम मात्र के चिप्स देखकर हैरानी से बोली, "का है जामें, जा बीस रुपया को आये!! का आवै बीस रुपया में। हेंई कित्ते चिपस जामें??" इतना बोल बड़बड़ाते हुए उसने कुछ चिप्स निकले और पति की ओर बढ़ाते हुए कहा, "लै खा ले।" पति ने सुना नहीं या फिर अनसुना कर दिया। उसने फिर कहा, "लै तू भी खा लै, कछु पेट को सहारा है जागो।" पति ने ले लिये और खाने लगा। अब वो भी काफी तेजी से चिप्स खाने लगी। मेट्रो चले जा रही थी और साथ ही साथ वो बातें किये जा रहे थे MRI, अल्ट्रासाउंड आदि की जिससे अनुमान लगा पा रहा था कि वो हॉस्पिटल से आ रहे हैं, शायद एम्स से। पति के चिप्स खत्म हो गए अब उसने हरे रंग की बिना किसी स्टीकर लगी स्प्राइट की बोतल निकली जिसमें स्प्राइट नहीं बल्कि पानी भरा हुआ था। पति ने थोड़ा सा मास्क नीचे किया और ऊपर मुँह करके बिना बोतल को मुँह से लगाये पानी पीने लगा और इतने में मेट्रो चल दी तो थोड़ा पानी नीचे उसके कपड़ों पर गिर गया। थोड़ी ही देर में मेट्रो ने याद दिलाया अगला स्टेशन राजेन्द्र प्लेस है। अब उसने एक बार फिर अपने पति को चिप्स दिखाते हुए कहा, "लै और लै-लै", पति ने न में गर्दन हिलाई। वो बोली " अरे! लै लै अभी हैं" पति ने गर्दन और हाथ साथ में हिलाते हुए मना किया और वो खुद खा ले ऐसा इशारा किया। अब यहाँ उसके शब्दों में विरोधाभास दिखा जब वो बोली, "अरे, लै लै अभी भोत ऐं। इत्ते सारे चिपस तो अभईं पड़े जा पैकट में।" सोचने की बात है कि जब उसने चिप्स का पैकेट खोला तो बीस रुपये के हिसाब से चिप्स बहुत कम लगे उसे। बाद में उन दोनों ने कुछ चिप्स खा लिये और दोनों के खाने के बाद भी जब एक बार और अपने पति को देती है और पति मना करता है तो उसे खाने के बाद भी बचे हुए चिप्सों की मात्रा उस मात्रा से ज्यादा लगती है जो उसने पैकेट को खोलते समय देखी थी। पति जानता है कि चिप्स कम हैं, साथ ही उसे अपनी भूख से ये भी अंदाज़ा है कि पत्नी को भूख लगी है। पत्नी के प्रति अपने प्रेम के कारण वो चिप्स लेने से मना करता है और वही दूसरी तरफ उसकी पत्नी भी जानती है कि उसके पति को भूख लगी है साथ ही उसे ये भी पता है कि सामान्यतया पुरुष को महिला की तुलना में अधिक भोजन की आवश्यकता होती है, इसलिए वो चिप्स न के बराबर बचने के बाद भी अंतिम बचे हुए चिप्स अपने पति को देना चाहती है वो भी यह झूठ बोलकर कि अभी बहुत से चिप्स बचे हुए हैं और उस पैकेट में बहुत से चिप्स हैं। पति के प्रति प्रेमवश वो यह भूल जाती है कि उसने चिप्स का पैकेट खोलते वक़्त क्या कहा था और अब क्या कह रही है। वो नहीं परवाह की उसके दोनों ही कथन तर्कसंगत हैं भी या नहीं। उसे नहीं समझ आता विरोधाभास। उन्हें समझ आता है तो प्रेम जिसका प्रदर्शन वो इसी प्रकार के गैर-तार्किक वक्तव्यों से करती है। यही हमारे भारत की संस्कृति है। विरोधाभास हमारी संस्कृति में अनिवार्य है।निश्चित प्रेम की उपस्थिति विरोधाभास में। जैसे माँ के दंड में होता बच्चे के लिए प्रेम और पिता की फटकार में होता है स्नेह अपने बेटे/बेटी के लिए।


-शीलू अनुरागी

29-04-2022

Wednesday, April 27, 2022

थप्पड़ मारूँगी:लड़कियों का ब्रम्हास्त्र


यूँ तो रोजाना ही न जाने कितनी ही घटनाएँ घटती हैं लेकिन आज सुबह की घटना ने तो मानो दिल को झकझोर कर रख दिया। साथ ही ये कोई सहानुभूतित नहीं स्वानुभितित घटना है। आज सुबह दिल्ली विश्व विद्यालय के लिए घर से निकला और तिलक नगर मेट्रो स्टेशन पहुँचा। वहाँ मैंने मेट्रो स्मार्ट कार्ड में रिचार्ज के लिए कार्ड के साथ 500/-रु. का नोट वहाँ मौजूद ऊँघती हुई महिला को दिया और कहा कि 200/-रु. का रिचार्ज कर दीजिये। वहाँ एक ऊँघती हुई महिला कर्मचारी थी जिसका नाम मैं देख नही पाया या यूँ कहिए कि मेरा ध्यान ही नहीं गया। लेकिन हाँ, वो आज (27-04-2022) की सुबह की शिफ्ट में थी।  कुछ देर बाद उन्होंने मुझे कार्ड दिया और दूसरे ग्राहक का रिचार्ज करने लगी और रिचार्ज होने के बाद भी मुझे खड़ा देख उनकी निगाहों में प्रश्नचिन्ह उभर आई जो कि मेरी ओर टिकी पुतलियों में साफ-साफ देख पा रहा था मैं। उनके पूछने ने पर मैंने बड़े  प्यारे और सभ्य शब्दों में कहा कि मेरे 300/-रु. बचे हैं वो वापस दे दीजिए। मेरे रुपये माँगने पर वो मुझसे प्रश्न करने लगी कि, "अपने कितने का कहा था?" मैंने कहा, "200/- का।" वो बोली "आपने नहीं बताया और मैंने बोला कि मैंने बताया था।" इस पर काफी देर जब बात हुई तो मैंने कहा कि "वैसे तो मैंने बोला था कि 200/- का रिचार्ज करना है, फिर भी यदि आपने नहीं सुना तो आपने पूछा क्यों नहीं?" वो बोली, "मैं यहाँ पूछने के लिए नहीं बैठी हूँ कि कितने का कारना है।" मैंने कहा, "आपको पूछना चाहिए आपने बिना पूछे 500/-रु. का रिचार्ज कैसे कर दिया?" वो बड़े ही अकड़ भरे शब्दों में बोली -"पूछना मेरा काम नहीं है।" वो अपनी गलती मान ही नहीं रही थी। मैंने पूर्णतः हैरानी भरे लहजे में पूछा- "यदि मैं 2000/- रु. का नोट दूँगा तो क्या पूरे का रिचार्ज कर देंगी आप, पूछोगी नहीं?" वो हिमालय के बराबर घमंड धारण किये कुर्सी पर टिकट हुए बोली-"मुझे जितने का नोट दोगे उतने का ही रिचार्ज कर दूँगी, पर पूछूँगी नहीं।" इस पर मुझे भी थोड़ा गुस्सा आया और मैंने ज़ोर देकर कहा, "आप पैसे डिडक्ट कर लो तो वो बोली ये मेरे बस की बात नहीं है।" 

मैंने कहा जब आप के बस की नहीं है तो आपने करने से पहले पूछा क्यों नहीं?

मुझे मेरे पैसे चाहिए क्योंकि आगे मेरे खर्चे के लिए पैसे नहीं हैं मेरे पास। 

बस इतने में ही उन्होंने ने बदतमीज़ी भरे शब्दों में कहा, "तू जा यहाँ से, पैसे वापस नहीं होंगे।" 

मैंने चेतावनी दी कि पहले तो आप तमीज़ से बात करिए। वो बोली "अबे तू जा यहाँ से, एक बार कह दिया कि पैसे वापस नहीं होंगे।"

 अब जब मुझे गुस्सा आया तो मैं भी तू-तड़ाक से बात की। अब उन्हें बुरा लगा और वो कहने लगी "बदतमीज़ी मत कर वरना थप्पड़ मारूँगी।"

मैंने पूरी तेज़ आवाज़ में बोला- "आ, हिम्मत है तो तू थप्पड़ मार कर दिखा, तेरे भी दो तीन घूँसे न जड़ दिए तो कहियो।" मेरे लिए क्या था कर नहीं तो डर नहीं। पर यहाँ पर अधिकतर लोग मुझे गलत कहेंगे कि तुझे ऐसे शब्द नहीं बोलने चाहिए थे। वो लड़की है उससे मर्यादित भाषा में बात करनी चाहिए थी। कई तो ये भी सोचेंगे कि यदि लड़का होता तो मैं ऐसा नहीं बोलता। लेकिन मैं जानता हूँ कि मैं ग़लत नहीं हूँ। मैं समझ तो चुका था कि वो अपने लड़की होने का गलत फायदा उठाने लगीं है।

मैंने यह देखा है कि अक्सर लड़कियाँ जब ग़लत होती हैं और उनके पास बचाव का कोई और रास्ता नहीं होता या फिर उन्हें किसी को नीचा दिखाना होता है और उनके पास एक ब्रम्हास्त्र होता है "थप्पड़ मारूँगी, तमीज़ में बात कर ले।" ये वाक्य सुनते ही न जाने कितने आसपास के पुरुष और स्त्रियाँ उसकी सेना बनकर उसके पक्ष में लड़के को मारने पीटने को तैयार हो जाते हैं। फिर वो भूल जाते हैं कि दुनिया में कुछ सही और गलत भी होता है।

अब उनके फैसले का मानदंड लिंग पर आधारित होता है। लड़की यानी सही और लड़का मतलब गलत। अब वो स्वंय को वीरांगना लक्ष्मीबाई से कम नहीं समझती। साथ ही पूरे दिन अपनी इस वीरता की चर्चा अपने मित्रों और रिश्तेदारों से करती हैं और आने वाली कई पीढ़ियों तक एक वीरगाथा के समान अपनी पुश्तों को सुनाती हैं।

इसके बाद मेरी तेज़ आवाज़ सुनकर आर्मी ऑफिसर्स आये और उन्होंने ने मुझसे कहा कि आप तमीज़ से बात करिए वो लड़की है और वैसे भी आपके पैसे हैं तो आपके कार्ड में आप ही के पास। पर मेरा प्रश्न ये है कि

क्या मेरा कोई सम्मान नहीं??

वो लड़की है तो क्या दाल ही दाल खाएगी? उन्होंने ने जवाब तो कोई नहीं दिया पर उनकी खामोशी चीख-चीख कर कह रही थी, हाँ!!हाँ.!!हाँ..!!

मैं लड़का हूँ तो क्या मुझे कहीं भी अपमानित किया जा सकता है? साथ ही ये भी उम्मीद की जाती है कि मैं उस अपमान के घूँट को निर्विरोध सह जाऊँ।

रही बात पैसों की तो क्या मैं रिक्शे का किराया मेट्रो कार्ड से दे सकता था?

क्या दोपहर का खाना मैं मेट्रो कार्ड से पैसे देकर खा सकता था?

साथ ही आर्मी अफसर ने ये भी कहा कि आप जाईये वरना आपके ऊपर फाइन(दंड) लगाया जाएगा।

अब देखिए एक तो मेरे जरूरत से अधिक के पैसों का रिचार्ज कर दिया गया न कि मेरे कहे अनुसार। दूसरे मेरे दिन के खर्च के लिए जो पैसे थे वो मेट्रो कार्ड में डाल दिये गए जिससे मेरा आगे का सफर क्या मेरा भोजन तक नहीं हो पाए। ऊपर से गलती कर के भी मेट्रो की एक कर्मचारी लड़की होने का फायदा उठाते हुए थप्पड़ मारने की धमकी देकर मुझे अपमानित करती है। उसके बाद विरोध करने और अपने पैसों की माँग करने पर वो अपनी गलती नहीं मानती बल्की मेरे ही ऊपर मेट्रो के द्वारा फाइन(दंड) लगाने की बात कही जाती है। ये तो वही बात हुई कि जिसकी लाठी, उसी की भैंस।

यदि ये भी मान लिया जाए कि ग़लतफ़हमी की वजह से ऐसा हुआ तो भी उसे अपनी ग़लती तो स्वीकारनी चाहिए पर नहीं, वो तो अपनी गलती स्वीकार करने की बजाए  उल्टे मुझी पर इल्ज़ाम लगाकर थप्पड़ मारने, जुर्माना लगाने आदि की धमकी दिला देती है।

क्या यही है मेट्रो का सभ्य स्टाफ??

क्या इसी प्रकार ग्राहक की सेवा करते हैं मेट्रो कर्मचारी??

इतना बुरा व्यवहार तो कोई अनपढ़ व्यक्ति भी नहीं करता अपने ग्राहक के साथ।

साथ यदि कोई मित्र न मिला होता तो पैसे न होने के कारण दिन भर भूखे पेट ही रहना पड़ता।

इसके लिए कौन जिम्मेदार है?

मैं विश्विद्यालय मेट्रो स्टेशन तक तो पैदल आ गया।

पर तिलक नगर से निलोठी गाँव तक मुझे पैदल जाना पड़ा? इसकी भरपाई कौन करेगा??

दिल्ली मेट्रो से अपील है कि वो अपने कर्मचारियों के व्यवहार में सुधार करें। उन्हें ये भी समझाएँ कि लड़का का अर्थ ग़लत नहीं होता।

साथ ही दिल्ली सरकार से ये अपील है कि सही ग़लत देखें लिंग के आधार पर फैसला न करें। लड़का और लड़की में यदि समानता लाना ही चाहते हैं तो व्यवहार भी समानता का होना चाहिए। मैं स्वयं महिला समर्थक हूँ किंतु सही अर्थ में। महिलाओं से निवेदन है कि नारीवादी बनें पुरुष विरोधी नहीं।

वैसे तो ये किसी एक जगह की बात नहीं है। ये सम्पूर्ण भारत में हो रहा है। स्त्री को बढ़ावा कम दिया जा रहा है और पुरुष शोषण अधिक किया जा रहा है। अब उत्तर प्रदेश की ही एक घटना ले लो जिसमें एक लड़की ने एक लड़के को भरे चौराहे पर थप्पड़ ही थप्पड़ मारे थे। लेकिन सोचो कि वह बच क्यों गई??

वो इसलिए क्योंकि वो लड़की थी। लड़की मारे तो निडर, बहादुर, क्रांतिकारी और वीरांगना किंतु यदि लड़का विरोध में हाथ भी पकड़ लेता तो वो बदतमीज़ कहलाता और साथ ही उस पर महिला के जिस्म को गलत मकसद से छूने का आरोप सिद्ध हो जाता जिसके लिए उसको जेल में जीवन व्यतीत करना पड़ सकता था। यदि बच भी जाता तो भी उसके चरित्र और मान-सम्मान की तो हत्या हो ही जानी थी। पर यदि कुछ न होता तो भी भरे बाजार बेवजह पिटने के कारण जो उसकी आत्मा को ठेस पहुँची उससे उसका आत्मविश्वास तो शायद उसे लानत देते हुए उससे हमेशा के लिए दूर चला जाता। लेकिन लड़की को सज़ा नहीं मिलेगी क्योंकि अब तो वो अबला है।

साथ ही यदि लडकियाँ और महिलाएँ समानता चाहती हैं जो कि होनी भी चाहिए, तो मौका परस्ती छोड़ दें। ये नहीं कि जहाँ लाभ दिखा बराबरी की माँग की और जहाँ लाभ दिखा अबला बन गए। सरकार जो कानून उनकी सुरक्षा के लिए बनाती है उनका प्रयोग अपने बचाव के लिए करें, किसी पर झूठे इल्ज़ाम लगाकर उसके व्यक्तित्व और चरित्र की हत्या करने के लिए नहीं।

लड़का-लड़की एक समान के नारे के फलस्वरूप लड़कों ने तो लड़की को अपने समकक्ष समझा, एक समान समझा लेकिन लड़कियों ने लड़कों को मात्र एक सामान समझा है जिसे वो कभी भी कैसे भी बरत सकती हैं।

-शीलू अनुरागी

27-04-2022


Sunday, January 16, 2022

समस्या पूर्ति-इन दिनों

 समस्यापूर्ति

कुछ भी नहीं है खास, इन दिनों।

तू जो नहीं है मेरे पास, इन दिनों।

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तू थी तो हर रात सौगात सी थी,

वो भी नहीं आती रास, इन दिनों।


जी तो रहा हूँ मेरी ज़िंदगी को मैं,

होता नहीं जीने का एहसास, इन दिनों।


साँसें और धड़कनें थम सी गई हैं,

हो गया हूँ ज़िंदा लाश, इन दिनों।


आँखें बिन देखे दिन-रात बरसे हैं,

हो गई हैं बिल्कुल चौमास, इन दिनों।


कभी तो होगी मेरे हाथ में हथेली,

शीलू को है ये विश्वास, इन दिनों।


-शीलू अनुरागी

Tuesday, September 21, 2021

शायरी-1

ग़ैरों के सहारे से ऊँचाई, तो बेल चढ़े हैं

हम वो दरख़्त हैं जो अपने दम पे खड़े हैं।

-शीलू अनुरागी


Thursday, March 18, 2021

शायरी

 मैं डगमगाऊँ तो भी, मुझे थामने न आना!!

बेशक़ तू मुझे देखना, पर सामने न आना!!

सोलह सिगरेट पीता हूँ||ग़ज़ल||शीलू अनुरागी

क्या बतलाऊँ तेरे बाद मैं कैसा जीवन जीता हूँ कितना और हारना है कितना भला मैं जीता हूँ मेरे सीने में एक समय में दुगना दर्द जो उठता है तेरे नाम...